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Friday, 14 August 2015

बाजारू औरते


वो क्या बुलाते हैं उन्हें,
बालो मैं मोगरे का गजरा लगाती
शाम होते से
टिक के खम्बो से, सडक किनारे खड़ी हो जाती
महकते इतर से उनके जिस्म
बुलाती रहती वो तिरछे नजरो से,
रस्तो पर से गुजरते आदमियों को बिना किसी इल्म
आँखों मैं गहरे काजल छुपाकर रखते उनकी कहानियां
होठो पर रहती हर वक्त मेहरून, लाल सी लालीयां
तो होठो के पीछे  गुस्से मैं छुपी वो बदचलन गलियाँ
हर रात
एक दो नहीं दस-दस आदमियों के बिस्तर पर गिरती वो
तब दो वक्त की रोटी गिरती उनके बच्चो की थालियाँ
चलाते उनके चेहरे पर हाथ
दे जाते गहरे दाग,  खाती पियक्कड़ आदमियों के जूते लात,
वो तंगी वाले आदमी
चप्पल तक लगा जाता उनके माथे
बिगड़ जाते उनके धंधे, कर जाते गरीबी मैं गिले आटे
बड़ी बहादुरी से रातो के अंधेरो मैं खड़ी वो औरते
बाजारों की रोशनी के बंद होते से, भूख से लड़ी वो औरते
बचने-बचाने को कुछ नहीं बचा यहा तक की आबरू उन औरतो की
शरीफ मोहल्लो मैं नहीं रहती इसलिए कहते बाजारू-जात उन औरते की
खा जाते समाज के अंदर पैदा हुए, शरीफ आदमी उन औरतो की आबरू
पहनकर वापिस अपने पतलून, खत्म कर तमाशे, बुलाते उन औरतो को बाजारू
वो रात के अंधेरो मैं हारी हुई औरते

वो समाज की गंदगी ढोती,  बाजारू औरते |

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