मेरे देश की बिंदी हैं, हिंदी
जहा लोग बसते भांति-भांति के
माँ, बहने सजाती माथा, बड़ी टिकी से
छोटी–बड़ी बिंदी
बोलती प्यार से तो बड़े दुलार से एक
ही भाषा, वो हैं हिंदी
सब भिन्न हैं ढेरो रंगों मैं
लिपटे-लिबासो मैं
एक सी सोच हर तकलीफ मैं एक सी
आशाओं मैं, बंधे
नहीं बोल पाते एक दुसरे की बोली
तो टूटे शब्द जोडकर बोलते एक ही भाषा,
वो हैं हिंदी
समझ की क्रांति सँजोती
महक राष्ट्र की, ह्दय मैं बोती
हिंदी चित्रपट मैं रंग परोसती
मेरी प्यारी भाषा, वो हैं हिंदी
पूरा देश मैं अनेकता, मैं एकता का
पाठ पढाती
दो प्रदेशो-दो संस्क्रती की समझ को जोड पाती
मेरी भाषा, वो हैं हिंदी
जब जोड़ना हो दिल इस देश मैं,
चाहे मराठी चाहे पंजाबी
चाहे असामी चाहे कश्मीरी
चाहे कन्नड़ चाहे सिन्धी
अपने लहजो मै तो अपने ढंगों मैं,
बोलते एक ही भाषा, वो हैं हिंदी |
आरिन रत्नेश सोराठिया

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