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Wednesday, 12 August 2015

बचपन की अमीरी


सोने की अट्ठन्नी,, , वो चांदी की चव्वनी
जैसे सारे ख्बाब खरीदने का रखती थी रुबाब,
बचपन की अमीरी, वो पुराने टूटे खिलोनों का खजाना
रेडिओ पर सुना वो पहला-पहला गाना
कुछ भी टुटा-फूटा सा गुनगुनाना,  पूरा अंतरा याद न होने पर कुछ भी गाना,

वो बचपन की अमीरी, जाने कहा रुखसत हो गई
जब हमारे भी पानी मैं जहाज चला करते थे,

खींच के सांसे, मींच के आँखे
हवा फुग्गो मैं भरा करते थेo,


उन दिनों तारो के दरमियाँ हमारे भी गुब्बारे उड़ा करते थे |

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