दुकान पे जब खड़ा होता
घर से सूची की कतार हाथ ले लेता |
आखिर पहुँचते से कतर देता सूचि की लम्बी जुबान,
सिर पर पसीना लाती, वो आनाज की महंगी दुकान |
भैया थोड़ी शक्कर देना
चासनी थोड़ी पिछले त्यौहार के बचे-कुचे बतासो की घोलकर पीना |
अनाज के खाली बर्तन करने लगते मेरे घर मैं अजाने
वो हवाओ का मुशाफिर खाना, बनी मेरे खाली कमरों की मचाने |
मन मर गया मेरा
किसने उसकी हत्या की
मन भर गया मेरा
गनीमत उसने आत्महत्या की |
महंगे परिधानों मैं लिपटा मन
कुतरन तक नही खरीद पाता मेरा मन
खुद को बेंचू तो भी कोई मोल नहीं लगाता
महंगे दुकानों मैं कभी-कभार घुस जाऊ तो
वहां का शीशा मुझे मुंह चिढाता
रास्तो पर आँख बचाता मैं
महंगे हो गए ख्वाहिशो से आँख चुराता मैं
खुद-को-खुद की औकात दिखाता मैं |
आरिन J

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