Translate

Friday, 17 July 2015

नेल्सन मंडेला अंतरराष्ट्रीय दिवस (१८ जुलाई)


मत छुपा मुझे
मेरे रंग चटक मारते है
चुंधिया देते हे यह आँखों को 
रस्ते पे चलने वालो की,
वो रुक रुक कर जबाब माँगते हैं...
कुछ तो दबे पाँव चलकर
रोशनदानो तक से झांकते है....
यह उजाले उगलते मेरे रंग,
खिड़की के काँचो को भी रोशनी बांटते हें...
रंग बिखर जाते हे गलियो से मचानो तक
सटी दीवालों पर चढ़ने वाले भी 
कई मर्तबा
थकककर हाफ्ते हैं.....
मत छुपाओ मुझे क्योंकि,
धुप से रोशनी,और रोशनी से चाँदनी,
धीरे धीरे मुझ तक पहुँचती हें
खुली रह गयी खिडक़ी से काँपते काँपते..
आखिर अब 
वो सब भी मेरा कद जानते हें ।
बोला था न तुझे
मत छुपाना मुझे 
मेरे रंग बहुत चटक मारते हें ।
यह कविता ठीक बैठती हैं, उन लोगो पर जिनके रंग कुछ खास थे, जिनके रंग किसी से नहीं छुपे, उनमे से एक थे श्री नेल्सन मंडेला, १८ जुलाई कई मायनो मैं हमारे लिए ख़ास हैं, यह दिन दुनिया भर मैं अपनी मेहनत और अहिंसात्मक व्यक्तित्व के धनी श्री नेल्सन मंडेला की याद मैं, नेल्सन मंडेला अंतर्राष्टीय दिवस घोषित किया गया हैं, यह दिन संयुक्त राष्ट्र की सहमति से २००९ से पारित किया था, तब से यह १८ जुलाई को मनाया जाता हैं|
इस दिवस को मनाने का मुख्य मकसद विश्व मैं शांति, आजादी और समानता का पाठ पढ़ाने वाले नेल्सन मंडेला
के विचारो और कदमो पर चलकर, आजादी का मतलब समझना और उसके लिए किये गए अथक प्रयास को समझाना हैं, नेल्सन मंडेला ने समानता, आजादी और शांति के लिए पूरा जीवन न्योछाबर कर दिया, २७ बर्ष उन्होंने कारावास मैं काटे, जिसमें वह छोटे से कमरे मैं रहे, जमीन पर सोए यहा तक की उनको मलमूत्र के लिए बाल्टी दी जाती थी और यातनाएं देने के लिए श्रमिक के तौर पर कठिन कार्य करवाए जाते थे,
२७ साल दिन
-रात दीवारों से बाते करना और हौसला कम न होने देना ही उस इंसान के लिए हमारे दिल मैं एक अलग जगह पैदा कर देता हैं, देखा जाए तो भारतीयों से नेल्सन मंडेला का घरेलु सम्बन्ध रहा हैं, जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका मैं गए तो उन्हें भी  असमानता का सामना करना पड़ा, भारतीयों को रंगभेद की समस्या का सामना करना पड़ता था, गांधीजी ने २० बर्ष वहां गुजारे, शायद यह दक्षिण अफ्रीका की हवा का असर ही था. की उस देश में पनप रही समस्याओ से संघर्ष करते-करते दो अलग देश मैं जन्मे व्यक्तियों को एक सा लड़ने जैंसे रंगभेद, असमानता, आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए शक्ति दी, उसके बाद जो भारत ने देखा, वो हम सब जानते हैं|
किन्तु..परन्तु..लेकिन, क्या नेल्सन मंडेला जी और गाँधी जी से पढ़ा  समानता, रंगभेद और आजादी का पाठ आज हम भूल गए हैं, हर बर्ष हजारो युवतिया बलत्कार की शिकार हो रही हैं हमारे देश मैं, वो क्या पहने, क्या ओढे, कितनी दूर तक घर से जाये, किस से बाते करे, किससे शादी करे, सब कुछ वो स्वयं नहीं निर्धारित कर सकती हैं, या तो उनका बाप या भाई या समाज निर्धारित करेगा, आज भी गोरे रंग की बहु हो तो दहेज कम कर दिया जाता हैं हमारे समाज मैं, बेटी के गोरे होने पर माँए चैन की सांस लेती हैं, की उनकी बेटियों को आसानी से लड़का मिल जायेगा, समाज मैं किसी अलग जाती के लड़के से शादी करने पर आनर किलिंग कर दिया जाता हैं, समाज मैं लोगो मैं असमानता को बडा चढ़ाकर परोसा जाता हैं ताकि जाती वर्ग को वोट के नाम पर उपयोग किया जा सके, यहा आज भी असामनता हैं, जातीभेद और रंगभेद हैं, फिर से हमें आज अपने रंग देखना चाहिये, क्या हम सब विभिन्न रंग के होकर एक ही विचारधारा रखेंगे  और क्या हम हजारो विचारो, भाषाओं के साथ एक रंग मैं ही रहना चाहेंगे |
धन्यवाद
आरिन



No comments:

Post a Comment