खरोंचे
खरोंचे उन औरतो के जिस्मो पर, नहीं दिखती हमे
न मुझे न तुझे....
न मुझे न तुझे....
ढँक लेती हैं वो बहुत सा हिस्सा
लम्बे परिधानों में.....
लम्बे परिधानों में.....
बैठती हैं वो हम से सटी जमीन पर
लिपटे रीती रिवाजो मैं |
ढंका बदन और छुपी हुई उनकी आत्मा कही
तिलमिलाती रहती, हर कभी......
आंसू उनके गिरते रहते रस्तो पर
तो खून बिस्तरों पर.... तकियो के कोने तक रहते तरबतर..
उठ गया था जो तेज घाव, थोड़ी छठप्ताहट के पश्चात
सब कुछ छुपा हैं मलमपट्टटी मैं लिपटा, नासूर तक
तुम भीड़ मैं, और उन औरतो के झुण्ड मैं
पहचान नहीं पाओगे किसको कितनी हैं जिस्म पर खरोंचे
जिस्म छुपा है परन्तु आँखों की गहराई मैं दिख ही जाती खरोंचे
वो आँख बचाती औरते
वो मुहं मोड़कर, खरोंचे छुपाती औरते |
आरिन
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